दो तीन साल पहले तक आदमी सिर्फ आदमी होता था, अब आदमी रायचंद, विचारचंद, तर्कचंद होते जा रहे हैं। आदमी जो सुकून के लिए पहले एक सांस छोड़कर एक सांस लेता था, खुले आसमान को निहारता था। अब वो आदमी सांस नहीं लेता, सांस के माध्यम से विचार लेता है और सांस के साथ विचार परोसता है। अब आदमी मोबाइल स्क्रीन पर अन्य आदमी के आसमान को निहारता है, और सुकून भरी सांस भरता है। आदमी के पास सुकून के लिए है घनघोर चर्चाएं, पॉडकास्ट और समर्पित जनरलिस्ट, थेरेपिस्ट हैं। आदमी का सुकून आदमी में न होकर आदमी द्वारा परोसे जाने वाले विचारों, सुविधाओं, प्रस्तुतियों, की तरफ सारगर्भित हुआ है। आदमी ने आदिमानव से आदमी होने की अपनी यात्रा पूर्ण कर ली है और नई यात्रा की ओर प्रस्थान किया है, यह यात्रा आदमी को कृत्रिम आदमी , और बुद्धि को कृत्रिम बुद्धि बनाने की यात्रा है। अब, आदमी को आदमी के शुद्ध रूप में पाना एक दुर्लभ सुंदर घटना है। जहां आदमी अपने विचारों, अनुभवों, पूर्वाग्रहों से बंधा न हो बल्कि इन सबके साथ और विमुक्त उन्मुक्त हल्का उड़ने योग्य होता जाय। हर एक आदमी को ऐसे आदमी का साथ चाहिए। हर साथी को ऐसा आदमी होना ...
भारत में जितने भी धार्मिक सम्प्रदाय विकसित हुए उनमें से अहिंसावाद को उतना महत्त्व किसी ने भी नहीं दिया, जितना जैन धर्म ने दिया है। बौद्ध धर्म में, फिर भी, अहिंसा की एक सीमा है कि स्वयं किसी जीव का वध न करो, किन्तु जैनों की अहिंसा बिलकुल निस्सीम है। स्वयं हिंसा करना, दूसरों से हिंसा करवाना या अन्य किसी भी भी तरह से हिंसा में योग देना. जैन धर्म में सबकी मनाही है। और विशेषता यह है कि जैन दर्शन केवल शारीरिक अहिंसा तक ही सीमित नहीं है, प्रत्युत, वह बौद्धिक अहिंसा को भी अनिवार्य बताता है। यह बौद्धिक अहिंसा ही जैन दर्शन का अनेकान्तवाद है। image is AI generated. अहिंसा का आदर्श, आरम्भ से ही, भारत के समक्ष रहा था, किन्तु, उसकी चरम-सिद्धि, इसी अनेकान्तवाद में हुई। इस सिद्धान्त को देखते हुए ऐसा लगता है कि संसार को, बहुत जागे चलकर, जहाँ पहुँचना है, भारत वहाँ पहले ही पहुँच चुका था। संसार में आज जो अशान्ति है, रह-रहकर विश्व में युद्ध के जो खतरे दिखाई देने लगते हैं, उनका कारण क्या है? मुख्य कारण यह है कि एक वाद के माननेवाले लोग दूसरे वादों को माननेवालों को आँख मूँदकर गलत समझते हैं। साम्यव...