मैं रोया तो था पर इस लहजे में की सिसकी न सुने कोई।
तकिया भींग गया था, इसका पता तब चला
जब सम्भाल लिया मैंने अपना पसीजता हृदय, तड़पती रूह ।
एक क्षण को तो इसलिए भी रोया कि रोता नहीं हूं मैं,
उसने कुछ ऐसा सताया की उसके बाद रोना ही नहीं आया।
आयी तो सिर्फ यादें, जिसे मैंने कुछ यू टालने का प्रयास किया
जैसे बहुत ही घातक कोई बीमारी, एक बीमार टालता है।
मैंने बहुत लपेटा इस तड़पती रूह को, कि बीमारी अच्छी नहीं है ।
हर बार बहुत कुछ समेटने के क्रम में कोमल कुछ छूट जाता रहा।
इसी तरह मैं बन पाया वो जो सिर्फ हंसता है, रोता नहीं है।
-06/05/2022
📌देहरादून
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