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जो रोता नहीं है!

मैं रोया तो था पर इस लहजे में की सिसकी न सुने कोई।  तकिया भींग गया था, इसका पता तब चला जब सम्भाल लिया मैंने अपना पसीजता हृदय, तड़पती रूह । एक क्षण को तो इसलिए भी रोया कि रोता नहीं हूं मैं, उसने कुछ ऐसा सताया की उसके बाद रोना ही नहीं आया।  आयी तो सिर्फ यादें, जिसे मैंने कुछ यू टालने का प्रयास किया  जैसे बहुत ही घातक कोई बीमारी, एक बीमार टालता है।  मैंने बहुत लपेटा इस तड़पती रूह को, कि बीमारी अच्छी नहीं है । हर बार बहुत कुछ समेटने के क्रम में कोमल कुछ छूट जाता रहा।   इसी तरह मैं बन पाया वो जो सिर्फ हंसता है, रोता नहीं है।   -06/05/2022 📌देहरादून

आदमी का आदमी होना

दो तीन साल पहले तक आदमी सिर्फ आदमी होता था, अब आदमी रायचंद, विचारचंद, तर्कचंद होते जा रहे हैं। आदमी जो सुकून के लिए पहले एक सांस छोड़कर एक सांस लेता था, खुले आसमान को निहारता था। अब वो आदमी सांस नहीं लेता, सांस के माध्यम से विचार लेता है और सांस के साथ विचार परोसता है। अब आदमी मोबाइल स्क्रीन पर अन्य आदमी के आसमान को निहारता है, और सुकून भरी सांस भरता है। आदमी के पास सुकून के लिए है घनघोर चर्चाएं, पॉडकास्ट और समर्पित जनरलिस्ट, थेरेपिस्ट हैं। आदमी का सुकून आदमी में न होकर आदमी द्वारा परोसे जाने वाले विचारों, सुविधाओं, प्रस्तुतियों, की तरफ सारगर्भित हुआ है। आदमी ने आदिमानव से आदमी होने की अपनी यात्रा पूर्ण कर ली है और नई यात्रा की ओर प्रस्थान किया है, यह यात्रा आदमी को कृत्रिम आदमी , और बुद्धि को कृत्रिम बुद्धि बनाने की यात्रा है। अब, आदमी को आदमी के शुद्ध रूप में पाना एक दुर्लभ सुंदर घटना है। जहां आदमी अपने विचारों, अनुभवों, पूर्वाग्रहों से बंधा न हो बल्कि इन सबके साथ और विमुक्त उन्मुक्त हल्का उड़ने योग्य होता जाय।  हर एक आदमी को ऐसे आदमी का साथ चाहिए।  हर साथी को ऐसा आदमी होना ...